कल शाम जब पहली बार मधुशाला पर पहुंचा तो जिन्दगी की तनहाई का एहसास हुआ, न जाने कितने लोग अपने सारे ग़म भुला कर नशे में डूब जाने को व्याकुल थे, मैंने भी ऑर्डर दिया। जब मदिरा की पहली बूंद गले से उतरी तब जिन्दगी की कड़वाहट का अंदाजा लगा। कड़वाहट धीरे धीरे कम हो रही थी, और मैं नशे मे डूबता चला जा रहा था। नशे मे दुनिया कितनी रंगीन लगती है, वो आज पता चला। इस खुबसूरत सी शाम में मैं अकेला बैठा था अपने अकेलेपन के साथ। मुझमें और मेरे अकेलेपन में बेहद ही करीबी रिश्ता है, बहुत ही गहरे दोस्त है हम दोनों। जब भी मैं थक जाता हूं, दुनिया से हार जाता हूं, ये मुझे अपने गले से लगाता है। यह मुझे मेरी कमजोरीयों की गहराइयों मे ले जाता है, जहां हम दोनों के सिवाय कोई नहीं होता। यह मुझे मेरे खोखलेपन का एहसास दिलाता है। वहां ना जीने का मोह होता है ना ही मरने का खौफ, ना कुछ पाने की उम्मीद होती है, ना कुछ खोने का डर, ना कोई हर्ष, ना कोई शोक, बस आनंद ही आनंद.............. मैं इन्हीं सब उलझनों में खोया हुआ था, कि तभी मेज पर रसीद रखते हुए वेटर ने आवाज दी साहेब मधुशाला बन्द करने का वक़्त हो गया.....। ABhishek...