कल से पुलवामा अटैक पर लोगों के रियेक्शंस देख रहा हूँ...

कल से पुलवामा अटैक पर लोगों के रियेक्शंस देख रहा हूँ.. लोगों का आक्रोश जरूर कहीं कुछ छुपे बैठे लोगों को अहसास दिला रहा होगा कि 'इस क्षेत्र में अभी स्कोप है'.. और इस तर्ज पर अगर हम आगे और सैनिक खोयें तो कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिये। एक सैनिक की तो यह नियति (दुर्भाग्य कह लीजिये) ही होती है कि वह मोहरे की तरह इस्तेमाल हो..
42 सैनिकों की शहादत दुर्भाग्य पूर्ण है लेकिन अपने आक्रोश के बीच एक पल के लिये सोचियेगा जरूर कि आतंकी हमले के इनपुट के बावजूद यह घटना कैसे घट गयी और किसी काॅनवाय के गुजरते वक्त जब अमूमन सड़क को सुरक्षित और खाली कर लिया जाता है तब एक विस्फोटकों से भरी कार कैसे वहां मौजूद रह गयी?
हर आक्रोशित भारतीय फौरन बदले की कार्रवाई चाहता है.. बदला.. किससे? पाकिस्तान का हाथ है, वह सबको पता है लेकिन यह आत्मघाती आतंकी हमला था न कि कोई सैनिक कार्रवाई, फिर पाकिस्तान से कैसे बदला लेने चल देंगे.. खासकर तब, जब वह भी हमारी तरह एक न्युक्लियर पावर है।
फिर किससे बदला.. उस संगठन से जिसके लोग कोई विशेष पहचान लिये सामने नहीं, तो उनके चक्कर में किस किस को मार देंगे? अगर आतंकवाद दमनात्मक कार्रवाई से खत्म हो सकता तो अब तक दुनिया भर से खत्म हो चुका होना चाहिये था.. क्या उस सिलसिले में कोई गंभीर प्रयास होते आपको दिखते हैं?
एक तबका यह कहता नजर आ रहा है कि सैनिकों की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिये। बिलकुल नहीं होनी चाहिये.. मैं इससे सहमत हूँ लेकिन ऐसा कहने वालों में बड़ा प्रतिशत जब उन लोगों का देखता हूँ जो ऐसे मौकों पर पिछली सरकार में गरजते बरसते थे कि यह दिल्ली में बैठी सरकार की कमजोरी है.. एक के बदले दस सर लायेंगे.. वगैरह-वगैरह.. तो थोड़ा ताज्जुब होता है कि कब ऐसे मौकों पर राजनीति नहीं हुई?
और सैनिक शहीद हुए हों तो सरकार की नाकामी पर सवाल उठाना राजनीति है लेकिन सैनिक सर्जिकल स्ट्राईक करें तो राजनीतिक मंचों से खुद उसका श्रेय लेकर ढिंढोरा पीटना, फिल्म तक बनवा देना.. वह राजनीति नहीं है?
कल टीवी डिबेट में कुछ खर्च हो चुके जनरल शनरल भी देशभक्ति से ओतप्रोत हुए समझा रहे थे कि यह जो रफाल शफाल पर हाय हौला हो रहा है, इससे पाकिस्तान को बल मिलता है। यह नहीं होना चाहिये.. सेना को राजनीति से परे रखना चाहिये, यानि सेना और देशभक्ति के नाम पर कोई भी लूट खसोट हो रही हो तो उसे देशहित में इग्नोर करना चाहिये तो मैं सीरियसली सोच रहा था कि क्या बोफोर्स सौदे को ले कर एक जमाने तक हायहल्ला करने वाले क्या युगांडा के लोग थे?
2014 के बाद से लगातार सेना को राजनीति में खींचने वाले क्या बांग्लादेश भूटान के लोग थे? सेना के आप्रेशन का अपने कारनामे की तरह ढिंढोरा पीटने वाले श्रीलंका के लोग थे?
पुलवामा में जो हुआ वह दरअसल न सिर्फ हमारी सुरक्षा व्यवस्था के मुंह पर तमांचा था बल्कि अपने आप में एक सवाल था कि आतंकवाद से निपटने के लिये कोई सही रणनीति अपनाई भी जा रही है या हम लगातार कुछ गलतियों को दोहराये जा रहे हैं या फिर हमारे कुशल रणनीतिकारों ने उन्हें भी इस्तेमाल करना सीख लिया है।
बाकी सैनिक तो बस मोहरे हैं शतरंज की बिसात पर.. जहां खेल कोई और लोग खेल रहे होते हैं।
शहीद सैनिकों को अश्रूपूर्ण श्रद्धांजलि 😢
              - अशफ़ाक़ अहमद

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