आज हसता हूँ मैं खुदपर क्यूँ
आज हसता हूँ मैं खुदपर क्यूँ । समय की बवंडर में फसकर क्यूँ ।। वक़्त ही देता है कमियो से सिख फिर भी करता है इंसान गलतिया अक्सर क्यूँ समय की रेखा ने मुझे तोडा या मेरे अपनों के अविश्वास ने अक्सर ये सवाल अकेले में उठता है क्यूँ आज हसता हूँ मैं खुदपर क्यूँ । समय की बवंडर में फसकर क्यूँ ।। यूँ तो कमियां होती है सबमे,मेरे में भी है पर कमियों को अकेले कुबूल मैं करता हूँ क्यूँ रिश्तों की डोर दोनों ही तरफ होती है पर अकेला सम्भालने में अक्सर उलझा मैं रहता हूँ क्यूँ आज हसता हूँ मैं खुदपर क्यूँ । समय की बवंडर में फसकर क्यूँ ।। अपनी कलम से... डॉ. अजय कुमार मिश्र