मानव ....क्यूँ ऐसा क्यूँ




आज अभी खुले आसमान के नीचे लेट जब तारो को देखा तो ख्याल आया कि इनकी वास्तव में नियति क्या है??
रोज रात निकल आते है और सुबह होते ही गायब हो जाते है । 
बहुत देर सोचा तो पाया कि इनसे भी बहुत बड़ी सीख़ मिलती है, कितना धैर्य कितना संयम कितना झुकाव है इनमे अपने जीवन के प्रति अपनी नियति के प्रति कितने दृढ है ये सब ।
वास्तव में सोचा तो एहसास हुआ कि इनकी यही प्रकृति है कि रात के वक़्त ही ये आते है और अपने से ज्यादा प्रकाश होने पर उनको सम्मान देते हुए कुछ समय ये मौन रहते है पुनः जैसे ही इन्हें अपना वक़्त मिलता है अपने संयम और ऊर्जा से ये पुनः चमकने लगते है ।
काश मानव भी अपनी प्रवित्ति में रह पाता ।
हर सुख के बाद दुःख , दुःख के बाद सुख आना तय है पर मानव क्यू अपनी प्रकृति भूल जाता है।
दुःख में तो सबका साथ ढूंढता है मानव पर सुख की अनुभूति होते ही वो अपनी पूर्व दशा को भूल जाता है ।
क्यू ऐसा क्यू ??


                                                                                                डॉ अजय मिश्र

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